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Tuesday, July 07, 2009

ibaadat

Some lines from a great poem by Bhupendra Bekal ji, which have made an impression on my heart, though I am miles away from following them.

बेरंग की रंगीन मस्ती में खोकर
हवस-भय-खुशामद से निर्लेप होकर

ख्यालों में मुर्शद के एहसां पिरोकर
इबादत है झुक जाना मशकूर होकर

........

'बेकल' इबादत में शर्तें हैं वर्जित
इबादत है कर देना खुद को समर्पित

(Worship is losing oneself in the colorful trance of this colorless Almighty; going beyond lust, greed, fear and flattery; Always keeping in mind the grace of God; worship is bowing to Him with gratitude. 
"Bekal", worship is not on conditions, worship is to surrender oneself fully.)


I pray to Almighty that I may be able to follow these in my life.

Monday, June 08, 2009

जब

ढलेगी रोशनी शमा-ए-दिल आजाद होगी
इसी बादल के साये में वो मुलाक़ात होगी

हमारी हसरतों को पर लगेंगे उल्फत के
हर एक आरजू मचलने को बेताब होगी

हवा जो छू के जायेगी तेरे रुखसारों को
मेरी हलकी सरगोशी भी उसके साथ होगी

ये चाँद घोलेगा मदहोशी स्याह पानी में
फिर आधे आधे से लफ्जों में अपनी बात होगी

तेरी हंसी का नूर बिखरेगा हर जानिब
इसी नशे में तेरी रूह भी शादाब होगी

शब-ए-मक़सूद की तलाश मुकम्मल होगी
मेरी जुबां से इक नयी ग़ज़ल ईजाद होगी

मैं सोच लूँगा अपनी आखिरी तमन्ना भी
भला दिल को भी धड़कने की कुछ याद होगी?

"कुबूल" है मुझे भी इंतज़ार थोडा सा
की खुदा ने सुनी किसी की तो फरियाद होगी

रुखसार- Cheek; जानिब - side, towards; शादाब - Fresh / Rejuvenate.

बेकरार

Life at IIT. Life with learnings, fun, dreams, freedom. And precious moments.
Learnt some things there. Left much more undiscovered.
Some lines I scribbled during a train journey from Kharagpur to Kolkata during last days of my college. I think it was 10th May 2008. Finally publishing it.
First couplet is from a song by Gulzar Saahab.

रुके रुके से क़दम, रुक के बार बार चले,
करार ले के तेरे दर से बेकरार चले।

कि कल तक इसी पल के इंतज़ार में थे हम,
अब आज चाह है कि और इंतज़ार चले।

इसी उम्मीद से कि कल ज़रा बेहतर होगा,
हम आज भर को सुकूँ मांगने उधार चले।

मेरा हर एक ख्वाब ज़िन्दगी में उतरेगा
यही खुशफहमी चले और ये खुमार चले

मैं एक रात मांगता हूँ तुझसे ऐ मौला,
उन्ही ख़्वाबों का सिलसिला फ़िर एक बार चले।

Thursday, May 01, 2008

विसाल

आंखों में नींद बची है कम, पर रात अभी भी बाकी है,
गीले सूखे अश्कों के संग, हर ख्वाब अभी भी बाकी है

ये आते जाते पेड़ भी अब, थोड़े से रुसवा लगते हैं,
पर इन क़दमों का रुकने से, इनकार अभी भी बाकी है

ये पागल दिल मेरा यूँ तो, कहता है रात मुख्तसर है,
और ख़ुद ही खुश होता है कि, माहताब अभी भी बाकी है

खाली राहों में कुछ साये, अब भी कहते से मिलते हैं,
कि इसी ज़िंदगी में अपना, कुछ साथ अभी भी बाकी है

खिड़की से अंधियारी सूनी, गलियों का मंज़र दिखता है,
इस दिल में नूर के क़दमों की आवाज़ अभी भी बाकी है

मेरी राहों के जैसा ही, ये शहर बियाबां लगता है,
बस उस दर पे इक जलता हुआ, चिराग अभी भी बाकी है

शब के जाने की आहट है, और शोर धडकनों का भी है,
साया सा उनका दिखता है, दीदार अभी भी बाकी है ।


मुख्तसर - Short lived, माहताब - moon, नूर - light, बियाबां - (dark, lonely) forest, सोया - doorstep, शब - night

विसाल - Union

Saturday, April 05, 2008

हक

One year later, again a treat at the same place, I again write something on friendship, something for my friends. Friendship for me is defined by the title of the poem. There are a million more thoughts in mind, and hopefully they will find escape in the next one. Here's me hoping. :)

हक

थोड़ा थोड़ा तेरा प्यार, अब भी सपने में मिलता है,
बीते लम्हों का गुलज़ार, अब भी सपने में मिलता है

राहें जुदा जुदा हैं बेशक, चाहत भी इकसार नही, पर
तेरे मेरे दिल का तार, अब भी सपने में मिलता है

धूप और छाँव अलग है अपनी, और बिछड़े से किस्से हैं, पर
इक सी रात सुकूं इकसार, अब भी सपने में मिलता है

उम्मीदों ख़्वाबों के जुगनू, मुझको बेशक भरमाते हैं,
हर तफरीह को तू तैयार, अब भी सपने में मिलता है

शायद वक्त हुआ है बिछड़े, और तुझको मैं याद नही हूँ,
मुझको तो तेरा दीदार, अब भी सपने में मिलता है

सबसे पक्की यारी शायद ऐसी ही जिद्दी होती है,
नहीं मिलूंगा कहकर यार, अब भी सपने में मिलता है

तेरी खुशियों की शहनाई, अब भी ख्वाब सजाती मेरे,
तुझपर मेरा हक वो यार, अब भी सपने में मिलता है ।

Tuesday, March 04, 2008

तलाश

किताबों में अपनी ग़ज़ल ढूँढता था,
आवाजों में अपनी असल ढूँढता था

वो खुश था या गमगीं, पता न चला कुछ,
बस एहसास का एक पल ढूँढता था

कभी इसकी महफिल, कभी उसकी महफिल,
हस्ती का सबब आजकल ढूँढता था

न तस्वीर कोई, न कोई थी पहचां,
जो बदले कभी न, शक्ल ढूँढता था

क्या मिलती उसे कुछ मदद दानिशों से,
जो ख़ुद जैसा एक पागल ढूँढता था

मुलाक़ात का पल भी कैसा अजब था,
महल में खड़ा वो महल ढूँढता था

"कुबूल" उसने करके ही पाया सुकूँ वो,
जिसे वो फज़ल-दर-फज़ल ढूँढता था





हस्ती - existence, सबब - reason / cause, दानिश - wisdom, फज़ल - attribute / quality (good)

Friday, February 01, 2008

मुलाक़ात

दिखने लगा छुपा हुआ वो प्यार भी हल्का सा,
आंखो में छलक आया है इक़रार भी हल्का सा

बस ख़त्म हो चला था, जितना था सब्र मन में,
बहुत हुआ लगा ये इंतज़ार भी हल्का सा

तेरे नूर का यही रंग, तेरे अक्स को तलब था,
चढ़ने को रूह पर मेरी, तैयार भी हल्का सा

सोचा न था कि इतना बेहतरीन होगा ये पल,
खुद पर से हट रह है इख्तियार भी हल्का सा

ख़ुशी कहूं, या क्या कहूं, एहसास को मैं अपने,
लगता है मेरे ख़्वाबों के ये पार भी हल्का सा

पर ये तो बस आगाज़ ही हुआ है उड़ने का,
होने का ख़त्म, न हो इंतज़ार भी हल्का सा

हर रोज़ नए आसमां मिलें एहसासों को,
बुझ गयी प्यास, न लगे इक बार भी हल्का सा

"कुबूल" हो दुआ मेरी बस एक मेरे मौला,
मांगू नहीं, तुझे जो नागवार भी हल्का सा



Monday, August 20, 2007

ख़्वाब



पलकों की सेज से उठा मेरा इक ख़्वाब वो चला,
दिखी है शायद उसको अपनी राह वो चला

रहता था, सजा करता था इन पलकों में कबसे,
है मुझसे छुड़ाकर के आज हाथ वो चला

उससे कहा मैंने जो, नहीं राह ये तेरी,
कह के कि आज तो है इन्कलाब वो चला

बिखरा जो ग़र, टुकड़े, मेरे दिल को ही चुभेंगे,
शायद उसे नही है ये एहसास वो चला

दिखता नही जो उसको हकीकत का कांच है,
मंज़िल का सोच अपनी कब्रगाह वो चला

टुकड़े हुआ, मुझको चुभा, मुझी को वो बोला,
मरता ना मैं, होता तू मेरे साथ जो चला

मैंने कहा मुझे तो मेरी राह है पता,
मरता नही कभी खुदा के साथ जो चला |



Thursday, April 19, 2007

सब रंग एक संग

This poem is for my wing-mates, we are like the colours in the colour-box, in which all different colours reside, and come together to create beauty. This poem includes some incidents that got imprinted in my memory. Love you unconditionally and hamesha, my bhailog !


सब रंग एक संग


हम साथ हैं तो ज़िंदगी की हर ख़ुशी मिली
यारों मेरे सौगात मुझको ये हसीं मिली

साहिल की रेत में जो था वो ढूँढता सीपी
इक रात उसको आसमान की परी मिली

रोशन मीनारें जिनको था बस दूर से देखा
उनकी भी इस नाचीज़ को शागिर्दगी मिली

लहरों में हाथ थाम कर खडे हुए थे जब
सुबह मुझे वो जिन्दगी की बेहतरीं मिली

मुश्किल था हाँ बेशक जो वक़्त दर्द में गया
रफ़्तार उसको पर तुम्हारे साथ से मिली

दिल को जो राह दिल से हो तो फासलों से क्या
बस न कहना मुझे तेरी चिट्ठी नही मिली





Thursday, April 05, 2007

शुक्रिया


शुक्रिया


जब कभी फिर तेरी हंसी का सिलसिला होगा,
खुदा ने बख्शा इस ग़ज़ल का ही सिला होगा ।

ये मेरे ख्वाब उतर जाएंगे तस्वीर मे तब,
कि जब वो आखिरी आँसू तेरा ढला होगा ।

तेरी खुशी से कोई और भी है खुश होता,
तेरी खुशी को जब इसका पता चला होगा ।

मेरी किस्मत मे तू नहीं न सही शुक्र तो है,
तेरा नसीब भी जिस दिन यूँ ही खिला होगा ।


तेरी आवाज़ को सुन पाऊँ खनकती जब फिर,
उस रोज़ फरिश्ता कोई मुझसे मिला होगा ।

मेरी दुआ "कुबूल" की होगी रहबर ने,
मेरी कोशिश को तेरा शुक्रिया मिला होगा ।




Wednesday, November 01, 2006

Ibaadat


Hai aisa nahi ki ye sunta nahi hai,
kabhi kabhi haan par, ye kehta "nahi" hai

zarurat hamari, isey har pata hai,
jo maange agar kuchh, tasalli dili hai

hai lagta hamein, intezar kuchh lamba,
par timing to iski hi sabse sahi hai

jo sochein, hamein chhod sab hai ye soche,
tab bhi soch iski hi sabse badi hai

jo poochhein, ibaadat, karein hum ye kab tak,
ibaadat to har saans se hi judi hai

sada pyaar karna, hai ye hi ibaadat,
namaazein to bas guftagu ki ghadi hain

Saturday, September 16, 2006

Do Kaanch ke tukde

Zameen par pade kaanch ke tukde ko na dutkaaro,
shaayad kisi ke aasmaan ka wo taara hoga

dikhta hai jo tumhare jahaan mein karkat saa,
kisi ke jahaan ka kiya roshan usney nazaara hoga

tumhaari zameen par jagah banaane ki koshish ne
kiya taraashney ka kaam usey saara hoga

dekhoge gar uski taraf zaraa gaur se,
uski adni si chamak ka tumhari aankhon mein bhi taara hoga

aur li tumne gar ye chamak har tukde se,
to bhara roshni se tumhara har kinaara hoga

har raah mein tumhaari bikhraa laakh taara hoga,
kyonki aise tukdon se to bhara jahaan saara hoga

aur maana jo har taare ko kaanch ka tukda,
tumhaari band aankhon ko na naseeb wo har sitaara hoga

zindagi galat hogi bas chamak se bachne mein,
kyonki aise tukdon se to bhara jahaan saara hoga.







Wednesday, April 19, 2006

So here I am on the blogspot...

Here goes my first thing on blogspot:


Jaante hain ki jo bhi ye karta hai, usme raaz kuchh khaas hota hai,
par fir bhi,
kisi na kisi kami ka insaan ko, hamesha ehsaas hota hai,
ye bhi, wo bhi, sab aa jaaye, hamesha ye prayaas hota hai.
ismein kuchh achha hga, ye aksar hamein nagawaar hota hai.

kabhi jab iski marzi ke chalte, asafal koi kaaj hota hai,
tab hi vishvaaas ki kasauti ka, imtihaan khaas hota hai.
khud ko agar sab kuchh maana, to hi nakaami ki yaas hoti hai,
aur ispar agar sab chhod diya, to man mein hamesha mithas hoti hai.

khudi ko buland karne se, man hamesha niraash hota hai,
chahe koi kuchh kahe, iski razaa ka hamesha raaj hota hai.
razaa ka hamesha raaj hota hai, razaa mein raaz kuchh khaas hota hai,
rehte hain jo razaa mein iski, unka kuchh alag hi mijaaz hota hai.

anguli mein chot se, kurbaani bachti hai raaja ki,
aur fir bhi uska man, kuchh din tak hi reh paaya ehsaanmand,
bhool gaya ki iski hi marzi se saab hota hai,
aur jo bhi ye karta hai, usme raaz kuchh khaas hota hai.



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