Wednesday, May 09, 2012

माज़ी

माज़ी ने फिर मुड़कर देखा, अबके ऐतराज़ नहीं आया,
वो भी गुज़रा हँसते हँसते, मैं भी नाराज़ नहीं आया 

लगता है सालों बाद इन्हें, फिर आंसू कहता हो कोई,
आँखों से रिसते पानी में, ज़िद का रंग आज नहीं आया

मुमकिन है इश्क एक से ही, बाकी हैं गर्ज़-ओ-फ़र्ज़ फक़त,
या प्यार सभी से करने का, मुझको अंदाज़ नहीं आया

अपने ही लफ़्ज़ों को हरदम, ढूँढा तेरी बातों में और 
लगता था मेरे दर ही क्यूँ, ये चारासाज़ नहीं आया

दिन की सो जाने की ख्वाहिश, शब की चाहत थी जगने की,
 कैसे कह दूं कि राहों में, दौर-ए -फ़रियाद नहीं आया 

फिर आज आखिर में याद आया, वो दस्तूर-ए-लफ्ज़-ए-"कुबूल",
जब तक हर पल में न देखा, रम्ज़-ए-इजाज़ नहीं आया 


माज़ी- past, गर्ज़ - selfish motive, चारासाज़  - healer, शब- night, रम्ज़ - secret / understanding, इजाज़ - (God's) benevolence / miracle

Monday, February 13, 2012

इकबाल

हर एक ज़र्रे को रोशन तेरा जमाल करे
किसे ख़बर है कहाँ पर तू क्या कमाल करे


तू हर जगह है मगर फिर भी छुपा रहता है
बशर है खाना-नशीं ख्वाहिश-ए-विसाल करे

मैं ये हर बार देख के भी भूल जाता हूँ
तू वही करता है सभी को जो खुशहाल करे

मार देती है मेरी सोच मुझे हर दफा और
मुझे हर बार जिंदा तेरा इक ख्याल करे

तेरा फ़ज़ल तू नहीं मांगता हिसाब वर्ना
मैं बिक ही जाऊँगा जो तू बस इक सवाल करे

बड़ी ख़ुशी से तूने किया है "कुबूल" मुझे
और एक मैं जो अब भी कोशिश-ए-इकबाल करे


 जमाल- aura, खाना-नशीं - trapped / in darkness/ misguided, ख्वाहिश-ए-विसाल - desire to meet, फ़ज़ल- grace, इकबाल- acceptance

Thursday, January 05, 2012

ख्वाहिश के टुकड़े

कहूं कैसे हुआ मुझको तेरे पास आ के क्या हासिल,
मेरा हर पल है तेरे रूबरू, बतला के क्या हासिल

मेरे मुग़ालते तेरे ही खेलों का नतीजा हैं,
पशेमाँ छोड़ अव्वल, फिर करम फरमा के क्या हासिल

मेरी ख्वाहिश के टुकड़े मुझको खींचें चारसूँ होकर,
तेरी मर्ज़ी है किस जानिब, बता दे तू, कि क्या हासिल

तू मुझसे प्यार करता है, मैं तुझसे प्यार करता हूँ,
तो फिर यूं इम्तिहानों में मुझे बैठा के क्या हासिल

मुझे ऐतबार न आये कि तू अच्छा ही करता है,
तो फिर ये क्यूँ हुआ, वो क्यूँ हुआ, समझा के क्या हासिल

ख़ुशी हो बासबब या बेसबब, दोनों नहीं टिकती,
खुदाई या खुदा को बेवफा ठहरा के क्या हासिल

सबूतों का रहा मोहताज, और बोला यकीं भी है
तो तुझको जानकर, करके "कुबूल", और पा के क्या हासिल


मुग़ालते- Confusions, पशेमाँ- Ashamed, अव्वल- Firstly , चारसूँ - Four directions, जानिब - Direction


 

Thursday, August 11, 2011

सोच

ये दिल क्यूँ सोच में दौड़े यहाँ वहाँ के लिए
मेरे साहिब की सोच सारे ही जहां के लिए

अगर ये गुल खिलें इक दूसरे के खिलने से
और एहतियाज क्या हसीन गुलिस्ताँ के लिए

तेरे ख्यालों में सबसे अज़ीम होगा ये
हर इंसान यूँही सोचे हर इन्सां के लिए
 
मेरे कदमों को हो ख्याल फ़क़त चलने का
सोच राहों की छोड़नी है रहनुमां के लिए

"कुबूल" हो सके मुझे हद-ए-मीनार-ए-मसीद 
 न आरज़ू हो किसी और आसमां के लिए

एहतियाज- requirement, अज़ीम- highest, हद-ए-मीनार-ए-मसीद - Zenith of the minaret in the mosque


Monday, August 08, 2011

हाल-ए-दिल

यूं तो मुरशद पे ही कुर्बान जुबां होती है
दिल-ए-ग़मगीन तेरी चाह कहाँ होती है

कभी निगाह में बस हसरतों का मजमा और
कभी तस्लीम तकाज़े का निशाँ होती है
 
तू भी होता है बेसुकून सा तन्हाई में
मेरी भी बंदगी शिकवों में बयाँ होती है

 है ये मालूम कि खालिक है निगेहबां फिर भी
 तेरी निगाह-ए-पाक-ओ-हया कहाँ होती है

ख्याल रहता है फैलाने का दामन को पर
सुराख कितने है ये होश कहाँ होती है

अमीर दुनिया में होने की चाह जिसको है
बिके इस दर पे वो औकात कहाँ होती है

तुझे सुनाया हाल-ए-दिल तुझे "कुबूल" भी हो
तेरे एहसास की हर सांस अज़ाँ होती है

 मजमा- gathering, तस्लीम- Salutation / respect, तकाज़े- demands, निगेहबां- is watching, निगाह-ए-पाक-ओ-हया - pious vision and dignity, अज़ाँ - call for prayer.

Thursday, May 19, 2011

मुन्तज़िर

तसव्वुर पर सिलवटें हैं, तेरे आने का सपना भी
हैं कबसे मुन्तज़िर आंखें, तो लाजिम है बरसना भी

समेटी याद बस तब तक, तेरी क़ुरबत मिली जब तक
बड़ा मुश्किल हुआ तबसे, कोई पल साथ रखना भी

मेरी आँखें भी अब मेरी तरह  ही होश में हैं जो
तेरा दीदार चलता है, नहीं रुकता तरसना भी

अभी तक मेरे दामन में तेरे आंसू सलामत हैं
है इक बारिश में नामुमकिन लहू के दाग बहना भी

तेरे चेहरे को हाथों की लकीरों में तलाशा बस
अजब कि जानता है ये दुआ के लफ्ज़ बुनना भी

ये अच्छा है खुदा पे हक फ़क़त ऐतबार का ही है
कि क्यूँकर आजमायें जब, नहीं आसाँ समझना भी

Friday, December 24, 2010

ईमान

ज़रा मुश्किल है दिल की बात का यूं तो जुबां होना
नहीं मुमकिन वफ़ा की सारी रस्मों का गुमां होना

नहीं दिल को थी कोई आरज़ू दुनिया की दौलत की
दिखी तेरी ख़ुशी बिकती, गिला था दाम न होना

जो है ऐतबार तो फिर यूं सबूतों की तलब क्यूँ हो
अगर है भी तो लाज़िम है, बखौफ़-ओ-पशेमां होना

कभी सुनते हैं उल्फत नाम है बेगर्ज़  होने का
कभी कहते हैं नादानी है कोई गर्ज़ न होना

कहे कोई क्यूँ मुझसे अपने सब वादे भुलाने को
हैं ये सारे सितम बेहतर, या खुद से बे-ईमां होना ?

नहीं ज्यादा समझ राह-ए-मुहब्बत की तो क्या कीजे
नहीं रुकता तेरी सूरत पे दिल का आशना होना

 लाज़िम - Necessary , बखौफ़-ओ-पशेमां - Fearful and ashamed, बेगर्ज़ - selfless, गर्ज़- selfish motive

Monday, December 20, 2010

Fir

फिर से  उन्ही अदाओं की ज़ंजीर मुझे दे
फिर तेरे फ़ज़ल  से बनी तासीर मुझे दे

हँसते हुए थी तूने कभी मुझपे अयाँ की
मखमल में रखी मेरी वो तकदीर मुझे दे

क्या खो गया कि इस क़दर मस्कीन मैं हुआ
कुछ तो सुराग मेरे अहल-ए-पीर मुझे दे


आँखों को बंद करने की सब कोशिशें नाकाम
क्या जाने कब दीदार मेरी हीर मुझे दे

बे-इख्तियार न हो मेरा हाथ फिर कभी
ना कभी ऐसी दानिश-ए-शरीर मुझे दे

ये नज़र आरज़ू में आज फिर से है उठी
इस आरज़ू को बना के तस्वीर मुझे दे

कि फ़क़त तख़ल्लुस  में न मौजूद हो खुदा
कर पाऊं सब कुबूल वो ज़मीर मुझे दे


----------
फ़ज़ल - Good attribute / goodwill,  तासीर - Nature, अयाँ - Bestow, मस्कीन - Poor, अहल-ए-पीर - Highest prophet, बे-इख्तियार - Out of control, दानिश-ए-शरीर - Disobedient wisdom, फ़क़त - only, तख़ल्लुस  - Pen name.

Friday, January 08, 2010

आहिस्ता

है भीड़ ख्यालों की लेकिन लहर-ए-अल्फाज़ आहिस्ता है
दुनिया का शोर-ओ-गुल है पर मेरी आवाज़ आहिस्ता है

क्यूँ सूरज धीरे जलता है, क्यूँ रात पिघलती है धीरे
क्यूँ बारिश में भीगी बूंदों की भी रफ़्तार आहिस्ता है

परसों के जैसा ही कल था, और आज भी कल के जैसा है
कल तो तेज़ी से गुज़रा था, जाने क्यूँ आज आहिस्ता है

जो चाँद फ़क़त दो हफ्ते में कामिल हो जाया करता था
रुकता बढ़ता, बढ़ता रुकता, चुपचाप बड़ा आहिस्ता है

तेरी आवाजें बहती हैं, मेरे ही घर में रहती हैं
सुनते हैं बुनते हैं ग़ज़लें, दो-चार अश'आर आहिस्ता हैं

दिखता है दिल को जब सुकून, डर भी मिलने आ जाता है
जिसके सदके ये दोनों हैं, तेरी वो बात आहिस्ता है

जब तेरे दर पर है "कुबूल", मेरी आँखों का हर सपना
जगने की क्यूँ बेचैनी है, क्यूँ लगती रात आहिस्ता है

लहर-ए-अल्फाज़ - Flow of words, अश'आर - (plural of ) couplet

Tuesday, July 07, 2009

ibaadat

Some lines from a great poem by Bhupendra Bekal ji, which have made an impression on my heart, though I am miles away from following them.

बेरंग की रंगीन मस्ती में खोकर
हवस-भय-खुशामद से निर्लेप होकर

ख्यालों में मुर्शद के एहसां पिरोकर
इबादत है झुक जाना मशकूर होकर

........

'बेकल' इबादत में शर्तें हैं वर्जित
इबादत है कर देना खुद को समर्पित

(Worship is losing oneself in the colorful trance of this colorless Almighty; going beyond lust, greed, fear and flattery; Always keeping in mind the grace of God; worship is bowing to Him with gratitude. 
"Bekal", worship is not on conditions, worship is to surrender oneself fully.)


I pray to Almighty that I may be able to follow these in my life.

Monday, June 08, 2009

जब

ढलेगी रोशनी शमा-ए-दिल आजाद होगी
इसी बादल के साये में वो मुलाक़ात होगी

हमारी हसरतों को पर लगेंगे उल्फत के
हर एक आरजू मचलने को बेताब होगी

हवा जो छू के जायेगी तेरे रुखसारों को
मेरी हलकी सरगोशी भी उसके साथ होगी

ये चाँद घोलेगा मदहोशी स्याह पानी में
फिर आधे आधे से लफ्जों में अपनी बात होगी

तेरी हंसी का नूर बिखरेगा हर जानिब
इसी नशे में तेरी रूह भी शादाब होगी

शब-ए-मक़सूद की तलाश मुकम्मल होगी
मेरी जुबां से इक नयी ग़ज़ल ईजाद होगी

मैं सोच लूँगा अपनी आखिरी तमन्ना भी
भला दिल को भी धड़कने की कुछ याद होगी?

"कुबूल" है मुझे भी इंतज़ार थोडा सा
की खुदा ने सुनी किसी की तो फरियाद होगी

रुखसार- Cheek; जानिब - side, towards; शादाब - Fresh / Rejuvenate.

बेकरार

Life at IIT. Life with learnings, fun, dreams, freedom. And precious moments.
Learnt some things there. Left much more undiscovered.
Some lines I scribbled during a train journey from Kharagpur to Kolkata during last days of my college. I think it was 10th May 2008. Finally publishing it.
First couplet is from a song by Gulzar Saahab.

रुके रुके से क़दम, रुक के बार बार चले,
करार ले के तेरे दर से बेकरार चले।

कि कल तक इसी पल के इंतज़ार में थे हम,
अब आज चाह है कि और इंतज़ार चले।

इसी उम्मीद से कि कल ज़रा बेहतर होगा,
हम आज भर को सुकूँ मांगने उधार चले।

मेरा हर एक ख्वाब ज़िन्दगी में उतरेगा
यही खुशफहमी चले और ये खुमार चले

मैं एक रात मांगता हूँ तुझसे ऐ मौला,
उन्ही ख़्वाबों का सिलसिला फ़िर एक बार चले।

Monday, May 11, 2009

Email communication skills

An email from my HR regarding a course on communication skills (esp email communication):

Dear All,
We are pleased to invite you for the "TalkShop" training scheduled for the 18th & 19th of March, 2009.
The focus of this session is to help the participants improve their communication skills and the session covers a range of communication models that include email communication, presentation skills, managing telephonic conversations, writing technical reports and specifications....

Program Details :-

Program : "Talkshop"

Date : 14th & 15th May 09
Venue : 0C001, OTP, #3 Bannerghatta Road, Bangalore, Karnataka 560029
Time : 9:30 am to 5:30 pm
----------------------------------------------------
Another email from the HR 3 minutes later:

Dear All,
We are pleased to invite you for the "TalkShop" training scheduled for the 18th & 19th of May, 2009.
The focus of this session is to help the participants improve their communication skills and the session covers a range of communication models that include email communication, presentation skills, managing telephonic conversations, writing technical reports and specifications....

Program Details :-

Program : "Talkshop"

Date : 14th & 15th May 09
Venue : 0C001, OTP, #3 Bannerghatta Road, Bangalore, Karnataka 560029
Time : 9:30 am to 5:30 pm

And then another:

The sender would like to recall the message, " Invite Mail -"TalkShop" -14th & 15th May 09".

Though the bullet (two of them in fact) had left the gun already, Another:

The sender would like to recall the message, " Invite Mail -"TalkShop" -14th & 15th May 09".


Finally, the last step (in showing what we will not do after attending this course ):

Hi All,
There is a typo in my previous mail. Request you to kindly ignore the same.
The program details are as follows:
Program : "Talkshop"
Date : 14th & 15th May 09
Venue : 0C001, OTP, #3 Bannerghatta Road, Bangalore, Karnataka 560029
Time : 9:30 am to 5:30 pm
Regret the inconvinience caused.


Life has its own way of making some things more interesting. Sometimes with just a play of copy-paste :)

Thursday, May 01, 2008

विसाल

आंखों में नींद बची है कम, पर रात अभी भी बाकी है,
गीले सूखे अश्कों के संग, हर ख्वाब अभी भी बाकी है

ये आते जाते पेड़ भी अब, थोड़े से रुसवा लगते हैं,
पर इन क़दमों का रुकने से, इनकार अभी भी बाकी है

ये पागल दिल मेरा यूँ तो, कहता है रात मुख्तसर है,
और ख़ुद ही खुश होता है कि, माहताब अभी भी बाकी है

खाली राहों में कुछ साये, अब भी कहते से मिलते हैं,
कि इसी ज़िंदगी में अपना, कुछ साथ अभी भी बाकी है

खिड़की से अंधियारी सूनी, गलियों का मंज़र दिखता है,
इस दिल में नूर के क़दमों की आवाज़ अभी भी बाकी है

मेरी राहों के जैसा ही, ये शहर बियाबां लगता है,
बस उस दर पे इक जलता हुआ, चिराग अभी भी बाकी है

शब के जाने की आहट है, और शोर धडकनों का भी है,
साया सा उनका दिखता है, दीदार अभी भी बाकी है ।


मुख्तसर - Short lived, माहताब - moon, नूर - light, बियाबां - (dark, lonely) forest, सोया - doorstep, शब - night

विसाल - Union

Saturday, April 05, 2008

हक

One year later, again a treat at the same place, I again write something on friendship, something for my friends. Friendship for me is defined by the title of the poem. There are a million more thoughts in mind, and hopefully they will find escape in the next one. Here's me hoping. :)

हक

थोड़ा थोड़ा तेरा प्यार, अब भी सपने में मिलता है,
बीते लम्हों का गुलज़ार, अब भी सपने में मिलता है

राहें जुदा जुदा हैं बेशक, चाहत भी इकसार नही, पर
तेरे मेरे दिल का तार, अब भी सपने में मिलता है

धूप और छाँव अलग है अपनी, और बिछड़े से किस्से हैं, पर
इक सी रात सुकूं इकसार, अब भी सपने में मिलता है

उम्मीदों ख़्वाबों के जुगनू, मुझको बेशक भरमाते हैं,
हर तफरीह को तू तैयार, अब भी सपने में मिलता है

शायद वक्त हुआ है बिछड़े, और तुझको मैं याद नही हूँ,
मुझको तो तेरा दीदार, अब भी सपने में मिलता है

सबसे पक्की यारी शायद ऐसी ही जिद्दी होती है,
नहीं मिलूंगा कहकर यार, अब भी सपने में मिलता है

तेरी खुशियों की शहनाई, अब भी ख्वाब सजाती मेरे,
तुझपर मेरा हक वो यार, अब भी सपने में मिलता है ।

Tuesday, March 04, 2008

तलाश

किताबों में अपनी ग़ज़ल ढूँढता था,
आवाजों में अपनी असल ढूँढता था

वो खुश था या गमगीं, पता न चला कुछ,
बस एहसास का एक पल ढूँढता था

कभी इसकी महफिल, कभी उसकी महफिल,
हस्ती का सबब आजकल ढूँढता था

न तस्वीर कोई, न कोई थी पहचां,
जो बदले कभी न, शक्ल ढूँढता था

क्या मिलती उसे कुछ मदद दानिशों से,
जो ख़ुद जैसा एक पागल ढूँढता था

मुलाक़ात का पल भी कैसा अजब था,
महल में खड़ा वो महल ढूँढता था

"कुबूल" उसने करके ही पाया सुकूँ वो,
जिसे वो फज़ल-दर-फज़ल ढूँढता था





हस्ती - existence, सबब - reason / cause, दानिश - wisdom, फज़ल - attribute / quality (good)

Friday, February 01, 2008

मुलाक़ात

दिखने लगा छुपा हुआ वो प्यार भी हल्का सा,
आंखो में छलक आया है इक़रार भी हल्का सा

बस ख़त्म हो चला था, जितना था सब्र मन में,
बहुत हुआ लगा ये इंतज़ार भी हल्का सा

तेरे नूर का यही रंग, तेरे अक्स को तलब था,
चढ़ने को रूह पर मेरी, तैयार भी हल्का सा

सोचा न था कि इतना बेहतरीन होगा ये पल,
खुद पर से हट रह है इख्तियार भी हल्का सा

ख़ुशी कहूं, या क्या कहूं, एहसास को मैं अपने,
लगता है मेरे ख़्वाबों के ये पार भी हल्का सा

पर ये तो बस आगाज़ ही हुआ है उड़ने का,
होने का ख़त्म, न हो इंतज़ार भी हल्का सा

हर रोज़ नए आसमां मिलें एहसासों को,
बुझ गयी प्यास, न लगे इक बार भी हल्का सा

"कुबूल" हो दुआ मेरी बस एक मेरे मौला,
मांगू नहीं, तुझे जो नागवार भी हल्का सा



Monday, August 20, 2007

ख़्वाब



पलकों की सेज से उठा मेरा इक ख़्वाब वो चला,
दिखी है शायद उसको अपनी राह वो चला

रहता था, सजा करता था इन पलकों में कबसे,
है मुझसे छुड़ाकर के आज हाथ वो चला

उससे कहा मैंने जो, नहीं राह ये तेरी,
कह के कि आज तो है इन्कलाब वो चला

बिखरा जो ग़र, टुकड़े, मेरे दिल को ही चुभेंगे,
शायद उसे नही है ये एहसास वो चला

दिखता नही जो उसको हकीकत का कांच है,
मंज़िल का सोच अपनी कब्रगाह वो चला

टुकड़े हुआ, मुझको चुभा, मुझी को वो बोला,
मरता ना मैं, होता तू मेरे साथ जो चला

मैंने कहा मुझे तो मेरी राह है पता,
मरता नही कभी खुदा के साथ जो चला |



Thursday, April 19, 2007

सब रंग एक संग

This poem is for my wing-mates, we are like the colours in the colour-box, in which all different colours reside, and come together to create beauty. This poem includes some incidents that got imprinted in my memory. Love you unconditionally and hamesha, my bhailog !


सब रंग एक संग


हम साथ हैं तो ज़िंदगी की हर ख़ुशी मिली
यारों मेरे सौगात मुझको ये हसीं मिली

साहिल की रेत में जो था वो ढूँढता सीपी
इक रात उसको आसमान की परी मिली

रोशन मीनारें जिनको था बस दूर से देखा
उनकी भी इस नाचीज़ को शागिर्दगी मिली

लहरों में हाथ थाम कर खडे हुए थे जब
सुबह मुझे वो जिन्दगी की बेहतरीं मिली

मुश्किल था हाँ बेशक जो वक़्त दर्द में गया
रफ़्तार उसको पर तुम्हारे साथ से मिली

दिल को जो राह दिल से हो तो फासलों से क्या
बस न कहना मुझे तेरी चिट्ठी नही मिली





Thursday, April 05, 2007

शुक्रिया


शुक्रिया


जब कभी फिर तेरी हंसी का सिलसिला होगा,
खुदा ने बख्शा इस ग़ज़ल का ही सिला होगा ।

ये मेरे ख्वाब उतर जाएंगे तस्वीर मे तब,
कि जब वो आखिरी आँसू तेरा ढला होगा ।

तेरी खुशी से कोई और भी है खुश होता,
तेरी खुशी को जब इसका पता चला होगा ।

मेरी किस्मत मे तू नहीं न सही शुक्र तो है,
तेरा नसीब भी जिस दिन यूँ ही खिला होगा ।


तेरी आवाज़ को सुन पाऊँ खनकती जब फिर,
उस रोज़ फरिश्ता कोई मुझसे मिला होगा ।

मेरी दुआ "कुबूल" की होगी रहबर ने,
मेरी कोशिश को तेरा शुक्रिया मिला होगा ।